Saturday, September 11, 2010

बोलो ना वादा करती हो


तुम नहीं जानती की तुम मेरे लिए क्या हो
तुम्हारा हर अंदाज मुझे बिल्कुल अलग सा दिखता है
लगता है तुम किसी देवलोक से आई हो
अप्सरा बन कर किसी के आँगन में बस्ती हो
तुमको कोई पहचान नहीं सकता
क्यों की
पहचानने के लिए मेरी नज़र चाहिए
और मेरी नज़र तो सिर्फ तुम्हारे लिए है
और तुम्हारे लिए ही रहेगी
तुम मेरा आदर्श हो मेरा स्वाविमन हो
ज़िन्दगी तो कम है मेरे पास
तुम्हारे साथ लम्बी ज़िन्दगी हम नहीं जी सकते
लेकिन ये वादा रहा हम जहा भी रहेगे तुम्हारा ख्याल रखेगे
और अगले जनम हम हमेसा के लिए मिलेगे
फिर कभी नहीं जुदा होगे
बोलो ना वादा करती हो
वादा करती हो ..........

1 comments:

वीना श्रीवास्तव said...

सुंदर भाव हैं कुछ वर्तनी की गलतियां कुछ अनर्थक शब्द हैं जिनके बिना भी पंक्ति पूरी होती है..जैसे
तुम कोई साधारण इंसान नहीं
तुम एक असाधारण इंसान हो

दूसरी पंक्ति में ये आता तो और सुंदर होता
असाधारण हो

बात वही है...इसमें ज्यादा खूबसूरती है, अनावश्यक शब्द नहीं हैं...उम्मीद है खराब नहीं लगेगा...

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